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महापुरुष जीवन परिचय 


आत्मा साकार है, या निराकार? भाग - 1.

 
काफी लंबे समय से कुछ लोगों द्वारा, इस बात का प्रचार किया जा रहा है कि आत्मा साकार है। 
     हम उन्हें अनेक वर्षों से समझा रहे हैं, कि आपका विचार ऋषियों के अनुकूल नहीं है। फिर भी वे इतने हठी लोग हैं, कि अपना हठ छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और सत्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
 
मुझे अनेक विद्वानों तथा श्रद्धालु व्यक्तियों ने प्रेरित किया, कि आप इस विषय में ऋषियों का विचार प्रस्तुत करें। उनके सुझाव का सम्मान करते हुए, सर्वहित के लिए मैं कुछ निवेदन कर रहा हूं।
 
ऐसे लोगों का यह कहना है कि--
 आत्मा साकार है। एकदेशी होने से । जो जो वस्तु एकदेशी होती है, वह वह  साकार  होती है। जैसे स्कूटर कार इत्यादि । आत्मा भी एकदेशी है। इसलिए आत्मा भी साकार है।
 
इन लोगों ने जो अपनी बात रखी है, इसमें इनका हेतु गलत है। हेतु का अर्थ है, अपनी बात को सिद्ध करने के लिए सही कारण बताना। इन्होंने जो कारण बताया, वह गलत है। न्यायदर्शन की भाषा में, गलत कारण को हेत्वाभास कहते हैं। इन्होंने जो कारण बताया है, यह सव्यभिचार  नामक हेत्वाभास है। अर्थात् जो हेतु दोनों पक्षों में चला जाए, वह सव्यभिचार हेत्वाभास कहलाता है। (इसी को अनैकांतिक हेत्वाभास के नाम से भी कहते हैं।)
 इनका हेतु यह था कि एकदेशी होने से, आत्मा साकार है। यह हेतु गलत इसलिये है, क्योंकि यह हेतु दोनों पक्षों में जाता है। अर्थात् एकदेशी वस्तुएं भी साकार हैं, और व्यापक वस्तुएं भी साकार हैं। ऐसी वस्तुएं भी हैं, जो पूरे ब्रह्मांड में व्यापक हैं, फिर भी वे साकार हैं। जैसे प्रकृति। सत्यार्थ प्रकाश के नौवें समुल्लास में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने प्रकृति को विभु अर्थात व्यापक लिखा है।
महर्षि दयानंद जी के वचन ये हैं --
"तीसरा कारण (शरीर) जिस में सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा होती है, वह प्रकृति रूप होने से सर्वत्र विभु और सब जीवों के लिए एक है।"
तो एकदेशी होने से साकार नहीं हुआ, व्यापक होने पर भी वस्तुएँ साकार हैं। इसलिए इनका हेतु गलत है। हेतु गलत होने से इनका पक्ष सिद्ध नहीं होता, कि आत्मा साकार है।
 
दूसरी बात - इनको अपने पक्ष की सिद्धि में कोई शब्द प्रमाण देना चाहिए था। इन्होंने आत्मा को साकार सिद्ध करने के लिए एक भी शब्द प्रमाण नहीं दिया। न कोई वेदवचन दिया, न कोई ऋषिवचन दिया, जिससे सीधा या अर्थापत्ति से सिद्ध होता हो, कि आत्मा साकार है। इसलिए इनकी बात सिद्ध नहीं होती। अर्थात् आत्मा को साकार कहना उचित नहीं है। 
 
तीसरी बात -- एक वस्तु में अनेक गुण कर्म  होते हैं । वे सभी गुण कर्म एक वस्तु में होते हुए भी, एक दूसरे को सिद्ध नहीं करते। क्योंकि उन सभी गुण कर्मों में, परस्पर साध्यसाधनभाव (कार्यकारणसंबंध) नहीं होता। यहां लोग गलती यह करते हैं, कि किसी भी गुण को लेकर किसी भी बात को वे सिद्ध करना चाहते हैं। जो कि साध्यसाधनभाव नियम के विरुद्ध है। 
जैसे एक उदाहरण --- 
एक मनुष्य संगीत कला जानता है। वह पाक विद्या भी जानता है। वह भोजन भी बनाता है। वह सैर भी करता है। कार भी चलाता है। वह सो भी जाता है। तो उसमें इस प्रकार से अनेक गुण कर्म होते हैं।।  
अब कोई यह कहे कि क्योंकि यह मनुष्य संगीत कला जानता है , इस कारण से यह बहुत अच्छा भोजन बनाता है।
तो अब आप सोचिए, यह अच्छा भोजन बनाने का जो कारण संगीत कला को बताया गया है, क्या यह ठीक है? क्या संगीत कला जानना, भोजन बनाने का कारण है? 
इस सरल सी बात को छोटा बच्चा भी समझ लेगा, कि यह कारण गलत है। भले ही उस मनुष्य में भोजन बनाने की कला भी है, संगीत कला भी है, और वह अच्छा भोजन बनाता भी है। फिर भी भोजन बनाना जो कार्य है, उसका कारण संगीत कला नहीं है। उसका कारण पाकविद्या है। 
ठीक इसी प्रकार से आत्मा में भी अनेक गुण कर्म हैं। वह एकदेशी भी है, निराकार भी है,  चेतन भी है, यज्ञादि कर्म भी करता है, खाता पीता सोता भी है। परंतु इन सबका आपस में कारण कार्य संबंध नहीं है। क्योंकि जहां जहां आप कारणकार्यसंबंध बताएंगे, वहां वहां उनमें साध्यसाधनभाव होना चाहिए, जैसा ऊपर के उदाहरण में बताया गया है। 
तो जैसे संगीत कला से भोजन नहीं बनता, वैसे ही एकदेशी होने से साकार भी नहीं होता। यदि एकदेशी होने से साकार होता, तो अर्थापत्ति प्रमाण से व्यापक होने से निराकार होना चाहिए। जबकि प्रकृति व्यापक है, तो भी साकार है। इसलिए एकदेशी होना और साकार होना, इन दोनों में कारणकार्यसंबंध या साध्यसाधनभाव नहीं है। इसलिए आत्मा को, एकदेशी होने से साकार मानना गलत है।
 
चौथी बात --- हम यह कहते हैं कि चलिये, थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए, कि आत्मा साकार है। तो ऐसा मानने से एक समस्या उत्पन्न होती है। और वह है, कि -  साकार होने का, जड़ होने के साथ साध्यसाधनभावहै। इसलिए जितनी भी साकार वस्तुएं होती हैं, वे सब जड़ होती हैं। जैसे सूर्य पृथ्वी स्कूटर कार इत्यादि। और जितनी भी चेतन वस्तुएं होती हैं, वे सब निराकार होती हैं। जैसे ईश्वर।
यदि आत्मा को भी साकार माना जाए, तो क्या आप उसे स्कूटर कार आदि के समान जड़ वस्तु भी मानेंगे? 
          हमारे इस प्रश्न का उत्तर वे कुछ नहीं देते। जब वे कुछ उत्तर नहीं देते, तो इस स्थिति को न्यायदर्शन में निग्रहस्थान के नाम से कहा जाता है , अर्थात जब व्यक्ति, विपक्षी के प्रश्न का उत्तर नहीं देता, तो इसका अर्थ है उसका पक्ष झूठ है, और बात यहीं खत्म हो जाती है।
 
परंतु वे हठ पकड़ कर बैठे हैं, वे मानते नहीं।
और हमें कहते हैं, आप आत्मा को निराकार सिद्ध करें।
 
ठीक है, हम आत्मा को निराकार सिद्ध करते हैं। कि ----
आत्मा निराकार है। चेतन होने से। जो जो वस्तु चेतन होती है, वह निराकार होती है। जैसे ईश्वर। आत्मा भी ईश्वर के समान  चेतन है। इसलिए चेतन होने से आत्मा निराकार है।
           हमारी इस बात के उत्तर में वे लोग चालाकी से ऐसा कहते हैं। यदि आप आत्मा को निराकार मानेंगे, तो उसे सर्वव्यापक भी मानना पड़ेगा। क्योंकि जैसे चेतन ईश्वर सर्वव्यापक है, ऐसे चेतन आत्मा भी सर्वव्यापक होना चाहिए। अब आप आत्मा को सर्वव्यापक सिद्ध करें।
 
वास्तव में यह उनकी चालाकी है। इस चालाकी को समझने के लिए आपको थोड़ा न्याय दर्शन का अध्ययन करना होगा। क्योंकि बातचीत करने के नियम और बातचीत करने में 54 प्रकार की गलतियाँ भी विस्तार से न्याय दर्शन में ही लिखे हैं।
 
(न्यायदर्शन में बातचीत करने के चार प्रकार बताए हैं। वाद, जल्प, वितंडा और  शंका समाधान।
 
बातचीत के प्रथम प्रकार -  वाद में दोनों पक्ष वाले अपने अपने पक्ष की स्थापना करते हैं। प्रमाण एवं तर्क से अपने पक्ष की सिद्धि और दूसरे का खंडन करते हैं। अपने सिद्धांत के विरुद्ध नहीं बोलते। और आवश्यकता पड़ने पर पंचावयव का प्रयोग भी करते हैं।
वाद का उद्देश्य सत्य असत्य की खोज करना है। यह शुद्ध बातचीत होती है। इसमें कोई झूठ छल कपट चालाकी बेईमानी नहीं की जाती। ईमानदार लोगों के लिए इसी प्रकार से बातचीत करने का विधान है।
 
दूसरा प्रकार है - जल्प। इसमें ऊपर बताए वाद के सारे नियम लागू होते हैं , तथा इसके अतिरिक्त इसमें झूठ छल कपट चलाकी बेईमानी सब कुछ किया जाता है। और इसका उद्देश्य होता है - अपनी बात को जैसे-तैसे जिताना और दूसरे को हराना, चाहे कितना भी छल कपट बेईमानी चालाकी आदि करनी पड़े। बातचीत का यह प्रकार अच्छा नहीं है। न्याय दर्शन में सत्य की खोज करने वालों के लिए इसका निषेध है।
 
बातचीत का तीसरा प्रकार है - वितंडा। इसमें जल्प के सारे नियम लागू होते हैं । बस अंतर इतना है कि वितंडा करने वाला व्यक्ति अपने पक्ष की स्थापना स्पष्ट रूप से नहीं करता , कि वह क्या मानता है? केवल दूसरे पक्ष पर आक्रमण ही करता जाता है। यह भी अच्छी बातचीत नहीं है । इसका उद्देश्य भी वही है जो जल्प का है। न्याय दर्शन में सत्य की खोज करने वालों के लिए इसका भी निषेध है।
सत्य की खोज करने वाले सज्जन लोगों के लिए न्याय दर्शन में बताया है कि वे केवल वाद का ही प्रयोग करें । जल्प और वितंडा से बचें। क्योंकि वह शुद्ध बातचीत नहीं है।
 
बातचीत का चौथा प्रकार - शंका समाधान है। उसमें एक व्यक्ति नम्रता और जिज्ञासा भाव से प्रश्न पूछता जाता है, और दूसरा व्यक्ति भी सत्य को समझाने के उद्देश्य से उसका उत्तर देता जाता है। उसमें वादी प्रतिवादी बनकर बातचीत नहीं की जाती। केवल जिज्ञासा भाव से प्रश्नोत्तर किए जाते हैं। अस्तु।)
 
अब हम विवादित विषय के संबंध में पुनः विनम्र निवेदन करते हैं। जिन लोगों ने यह सिद्धांत चलाया है कि आत्मा साकार है, वे लोग न्याय दर्शन में कुशल नहीं हैं। न तो उन्होंने न्याय दर्शन का अध्ययन ठीक प्रकार से किया है। और न ही उन्हें वाद करना आता है। 
वे वाद नहीं कर रहे। जिससे बातचीत करनी चाहिए। क्योंकि यह बातचीत का शुद्ध प्रकार है।
बल्कि वे लोग जल्प का प्रयोग कर रहे हैं। जिसका निषेध है। क्योंकि इसमें झूठ छल कपट चालाकी का प्रयोग होता है।
 
तो न्याय दर्शन में बताया है, कि जल्प और वितंडा में बोलने में व्यक्ति 54 प्रकार की गलतियां करता है। 
उनमें से 24 प्रकार की जातियां (चालाकी) हैं.
22 प्रकार के निग्रहस्थान (बात का उत्तर गलत देना या चुप रहना) हैं.
 3 प्रकार का छल (वक्ता के अभिप्राय को तोड़ मरोड़ कर उसका खंडन करना) है.
और 5 प्रकार के हेत्वाभास (गलत कारण बताना) हैं. 
ये कुल मिलाकर 54 प्रकार की गलतियां होती हैं, जो न्याय दर्शन में बताई गई हैं। ( चालाक और बेईमान लोग जल्प और वितंडे में इस प्रकार की 54 में से कुछ गलतियां करते हैं। वाद में इनका प्रयोग नहीं किया जाता।)
 
  इन लोगों ने इन गलतियों में से जो गलती की है, वह है जाति = चालाकी = धोखाधड़ी।  जिस कारण से उन्होंने सब लोगों में यह भ्रांति फैला दी, कि आत्मा साकार है.  
 
आप इसे पढ़ना चाहें तो न्याय दर्शन के पांचवें अध्याय में प्रथम आह्निक के सूत्र संख्या 4 में पढ़ सकते हैं। वहां पर एक जाति का नाम है, उत्कर्षसमा जाति।
 
इनके कथन में उत्कर्षसमा जाति का प्रयोग है।
 ये लोग जो कह रहे हैं कि यदि आत्मा ईश्वर के समान निराकार है, तो वह ईश्वर के समान सर्वव्यापक भी होना चाहिए. 
 
इसमें जाति मतलब चालाकी या धोखाधड़ी यह है, कि जो दृष्टांत ईश्वर का दिया गया है,  उस दृष्टांत की एक विशेषता = व्यापकता को, साध्य अर्थात जीवात्मा में बढ़ा करके दिखलाना, यह उत्कर्षसमा जाति है।
उन्होंने यही आरोप लगाया है , कि
दृष्टांत = ईश्वर के तुल्य, साध्य =आत्मा भी सर्वव्यापक होना चाहिए. 
 यह उत्कर्षसमा जाति का प्रयोग है। चालाकी से सत्य का खंडन किया जा रहा है। जो कि ईमानदारी नहीं, बल्कि धोखाधड़ी है।
 
इसलिये इसे शुद्ध बातचीत नहीं कहा जा सकता।
 यदि आपकी इच्छा हो, तो न्याय दर्शन में अध्याय 5, आह्निक 1, सूत्र 4 में देख लीजिए। बुद्धिमानों को समझ में आ जाएगा,  कि वास्तव में यह चालाकी से सत्य का खंडन किया जा रहा है। यह ईमानदारी नहीं है।
 
आत्मा निराकार है, इस विषय में महर्षि दयानंद सरस्वती जी के प्रमाण, भाग - 2 में प्रस्तुत किए जाएंगे। 
विनम्रतापूर्वक धन्यवाद....।
 
लेखक -- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।
 

आत्मा साकार है, या निराकार? भाग - 2

अब आत्मा निराकार है। इस विषय में महर्षि दयानंद सरस्वती जी के प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं।
 
प्रमाण -- 1.
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने पूना में कुछ प्रवचन किए थे । उन प्रवचनों की पुस्तक बनी, जिसे लोग "उपदेश मंजरी" के नाम से जानते हैं। उन प्रवचनों में उन्होंने प्रथम उपदेश में कहा कि जीवात्मा निराकार है। उनके शब्द इस प्रकार से हैं।
क्योंकि शरीर स्थित जो जीव है, वह भी आकार रहित है। यह सब कोई मानते हैं, अर्थात वैसा आकार न होते हुए भी हम परस्पर एक-दूसरे को पहचानते हैं।
इस वचन में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने स्पष्ट ही जीवात्मा को आकार रहित अर्थात् निराकार स्वीकार किया है । फोटो संलग्न है।
 
प्रमाण -- 2. 
इसी प्रकार से उपदेश मंजरी के चतुर्थ उपदेश में भी कहा है। वहां उनके वचन इस प्रकार से हैं।
जीव का आकार नहीं, तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं? ज्ञान सुख-दुख इच्छा द्वेष  प्रयत्न ये नष्ट होते ही जीव निकल जाता है, यह किसान भी समझता है।
इस वचन में भी महर्षि दयानंद जी  ने जीव को आकार रहित अर्थात् निराकार ही माना है। फोटो संलग्न है।
 
प्रमाण -- 3. 
महर्षि दयानंद सरस्वती जी का एक हस्तलिखित पत्र का फोटो भी मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। उनके पत्रों की कोई पुस्तक छपी होगी । उसका फोटो भी मैं भेज रहा हूं । उस पत्र में भी उन्होंने स्वीकार किया है, कि आत्मा निराकार है।
* यच्चेतनवत्त्वं तज्जीवत्त्वम्। जीवस्तु खलु चेतनस्वभावः। अस्येच्छादयो धर्मास्तु निराकारोsविनाश्यनादिश्च वर्तते।*
अर्थात जो चैतन्य गुणवाला है, वह जीवात्मा है। जीवात्मा चेतन स्वभाव वाला है। इसके इच्छा आदि धर्म हैं। यह निराकार है, अविनाशी = नष्ट न होने वाला और अनादि है।
इस पत्र में भी महर्षि दयानंद जी ने आत्मा को निराकार माना है।
 
प्रमाण -- 4.
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकाश के सातवें समुल्लास में यह लिखा है। फोटो संलग्न है।
वहाँ प्रश्न है -- ईश्वर साकार है वा निराकार?
 इसके उत्तर में -- उन्होंने लिखा है, निराकार। वह पूरा अनुच्छेद पढ़ें। वहाँ  जिस वाक्य के नीचे लकीर लगी है, वह वाक्य यह है। 
क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता है उसको संयुक्त करने वाला निराकार चेतन अवश्य होना चाहिए।
इस वाक्य को विशेष ध्यान से पढ़ें।
 यद्यपि वहां यह कथन ईश्वर के संबंध में है। परंतु यदि उसे ऊहा से जीवात्मा पर भी लागू करें, तो वह जीवात्मा पर भी लागू होता है।
इस वाक्य के अनुसार यदि ईश्वर चेतन होते हुए परमाणुओं का संयोग करके सृष्टि को बनाता है, और वह निराकार है।
तो इसी प्रकार से आत्मा भी चेतन होते हुए लोहा लकड़ी आदि वस्तुओं का संयोग करके  स्कूटर कार रेल आदि वस्तुएँ बनाता है, तो वह भी निराकार सिद्ध होता है। जब चेतन  ईश्वर वस्तुओं का निर्माता होने से निराकार है, तो चेतन आत्मा, ईश्वर के समान वस्तुओं का निर्माता होने से निराकार क्यों नहीं?
यहां स्पष्ट लिखा है निराकार चेतन है।
जब आत्मा चेतन है, तो सिद्ध हुआ कि वह निराकार है।
 
हमने आत्मा को निराकार सिद्ध करने के लिए महर्षि दयानंद सरस्वती जी के 4 प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। परंतु साकार मानने वालों ने 1 भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया, जिसमें सीधा साकार लिखा हो, अथवा अर्थापत्ति आदि से भी साकार सिद्ध होता हो।
ये लोग आत्मा को एकदेशी ही सिद्ध करते रहे, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि आत्मा को एकदेशी तो हम भी मानते हैं । इस विषय में तो कोई विवाद था ही नहीं । आत्मा को एकदेशी सिद्ध नहीं करना था, बल्कि साकार सिद्ध करना था, जो कि इन्होंने नहीं किया।
ये लोग एकदेशी होने से आत्मा को साकार कहते रहे। जो कि सिद्ध नहीं हो पाया।
क्योंकि यह अनैकांतिक हेत्वाभास है।
 
इन लोगों की भ्रांति का कारण ---
 
इसके अतिरिक्त एक और बात कहना चाहता हूँ, जिसके कारण ये लोग भ्रांति में हैं। 
इनको भ्रांति यह है, कि ये लोग आकार गुण तथा परिमाण गुण दोनों में अंतर नहीं समझ रहे हैं। ये परिमाण गुण को आकार गुण समझ रहे हैं। यह इनकी सबसे बड़ी भूल है, जिसके कारण इन्हें भ्रांति पैदा हुई। 
जबकि वैशेषिक दर्शन में 24 गुणों में, परिमाण गुण को अलग बताया है और आकार (रूप) गुण को अलग बताया है। 
आकार का अर्थ क्या है? श्री वामन शिवराम आप्टे, इस विद्वान का लिखा हुआ "संस्कृत हिंदी कोष", शिक्षा जगत में एक प्रामाणिक कोष है। इस कोष में आकार शब्द का अर्थ देखिए। वे लिखते हैं.... आ+ कृ + घञ् = आकारः। इस शब्द में आ उपसर्ग , कृ धातु, और घञ् प्रत्यय है। इस प्रकार से आकार शब्द बनता है। और इसका अर्थ आप्टे कोष में लिखा है= रूप, शक्ल, आकृति।
इस प्रकार से आकार शब्द का अर्थ हुआ कोई रूप हो, शक्ल हो, आकृति हो, उसका नाम आकार है। फोटो संलग्न है।
 ये लोग आत्मा को साकार बता रहे हैं। अब बुद्धिमान लोग विचार करें, क्या आत्मा का कोई रूप है, कोई शक्ल है, कोई आकृति है? यदि नहीं है, तो साकार कैसे हुआ?
इतनी मोटी बात भी ये लोग नहीं विचार कर सके। आप इसी बात से इनकी बुद्धि का अनुमान कर सकते हैं।
वैशेषिक दर्शन में रूप गुण को अलग बताया है, और परिमाण गुण को अलग बताया है। इस प्रकार से रूप का नाम जब आकार है, तो आकार और परिमाण दोनों अलग-अलग गुण हुए। 
अब ऋषियों का यह सिद्धांत है कि जिस वस्तु में रूप है, अर्थात आकार है, वह साकार वस्तु है। जिस वस्तु में रूप नहीं, आकार नहीं, वह निराकार वस्तु है। परंतु परिमाण गुण दोनों में है, साकार में भी और निराकार में भी।
जैसे कि पृथ्वी सूर्य आदि पदार्थों में आकार गुण भी है और बड़ा आकार होने से महत्परिमाण भी है। तो यह हो गया साकार द्रव्यों में परिमाण गुण।
 अब आत्मा और ईश्वर, ये दोनों निराकार द्रव्य हैं, इनमें किसी में भी रूप गुण या आकार गुण नहीं है, परंतु परिमाण गुण इन दोनों में भी है। 
कठोपनिषद में लिखा है.. अणोरणीयान्  महतोमहीयान्...।। अर्थात ईश्वर अणु से भी अणु है और महत् से भी महत् है। अर्थात छोटे से छोटा है और बड़े से बड़ा पदार्थ है। इस प्रकार से निराकार ईश्वर में परिमाण गुण स्वीकार किया है। 
तथा निराकार आत्मा में भी परिमाण गुण है । मुंडक उपनिषद 3/1/9 में आत्मा को अणु कहा है। एषोsणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पंचधा संविवेश।। यह आत्मा अणु अर्थात् सूक्ष्म/छोटा है। यहाँ परिमाण बताया है, न कि आकार।
 वैशेषिक दर्शन में भी ईश्वर एवं आत्मा को परिमाण गुण वाला स्वीकार किया है। 
विभवान्महानाकाशः।। तथा चात्मा।। तदभावात् अणु मनः।। तथा चात्मा।।
अर्थात् व्यापक होने से आकाश महत्परिमाण वाला है।। और इसी हेतु से अर्थात व्यापक होने से ही ईश्वर भी महत्परिमाण वाला है।। व्यापक न होने से मन अणु अर्थात्  एकदेशी है ।। और इसी हेतु से अर्थात व्यापक न होने से आत्मा भी अणु परिमाण अर्थात् एकदेशी है।।
इन सूत्रों में भी आत्मा तथा ईश्वर को परिमाण गुण वाला बताया है, साकार नहीं। यदि आप आत्मा को अणु का अर्थ एकदेशी, और एकदेशी होने से साकार कहेंगे, तो कठोपनिषद एवं वैशेषिक दर्शन के प्रमाणों  के आधार पर आपको ईश्वर को भी साकार मानना पड़ेगा। क्योंकि परिमाण तो इन दोनों में बताया गया है।
तो सार यह हुआ कि ये लोग परिमाण और आकार गुण में अंतर नहीं समझ रहे। इसलिए इन्होंने परिमाण को भ्रांति से आकार मानकर जीवात्मा को साकार कहना आरंभ कर दिया। ईश्वर इन लोगों को सद्बुद्धि दे, ये लोग सत्य को समझ सकें। हमारी ओर से इनके लिए बहुत शुभकामनाएं।
 
 इसलिए सब बुद्धिमानों को इस विषय में गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए, और यह निश्चय जानना चाहिए कि महर्षि दयानंद सरस्वती जी का सिद्धांत यही है कि आत्मा निराकार है।
विनम्रतापूर्वक धन्यवाद....।
 
लेखक -- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।
स्वामी दयानन्द सरस्वती
स्वामी दयानन्द सरस्वती अपने महान व्यक्तित्व एवं विलक्षण प्रतिभा के कारण जलमानस के हृदय में विराजमान हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती दन महान संतों में अग्रणी हैं जिन्होंने देश में प्रचलित अंधविश्वास, रूढिवादिता, विभिन्न प्रकार के आडंबरों व सभी अमानवीय आचरणों का विरोध किया। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने तथा हिन्दू धर्म के उत्थान व इसके स्वाभिमान को जगाने हेतु स्वामी जी के महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारतीय जनमानस सदैव उनका ऋणी रहेगा।
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म सन् 1824 ई. को गुजरात प्रदेश के मौरवी क्षेत्र में टंकरा नामक स्थान पर हुआ था। स्वामी जी का बचपन का नाम मूल शंकर था। आपके पिता जी सनातन धर्म के अनुयायी व प्रतिपालक माने जाते थे। स्वामी जी ने अपनी प्रांरभिक शिक्षा संस्कृत भाषा में गृहण की । धीरे-धीरे उन्हें संस्कृत विषय पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो गया। बाल्यकाल से ही उनके कार्यकलापों में उनके दिव्य एवं अद्भुत रूप की झलक देखने को मिलती थी।
स्वामी जी को बाल्यकाल से ही ऐसा वातावरण प्राप्त हुआ जिसमें सम्पूर्ण देश पराधीनता की बेडियों में जकडता जा रहा था । तत्कालीन भारत विदेशी शासन के अधीन था। अपने देशवासियों के प्रति अमानवीय व्यवहार ने उनके मनोमस्तिष्क को आंदोलित करना प्रारम्भ कर दिया। विदेशी दासत्व के अतिरिक्त समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की कुरीतियों एवं अंधविश्वास आदि के वातावरण ने उनके अंतर्मन को झकझोर दिया।
स्वामी जी ने 21 वर्ष की आयु में ही अपने घर-परिवार का परित्याग कर वैराग्य धारण कर लिया। योग-साधना तथा कठोर तप से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे अपने साधना पथ पर अनेक प्रकार के योगियों, साधु-संतों व महात्माओं से मिले परन्तु इनकी जिज्ञासा समाप्त नहीं हुई।
वे हरिद्वार, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि तीर्थ-स्थलों एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों का परिभ्रमण करते रहे। भ्रमण के दौरान ही मथुरा में उनकी महान योगी एवं सन्त विरजानंद जी से मुलाकात हुई। वे उनकी विद्वता  से अत्यंत प्रभावित हुए तथा उन्हें अपना गुरू मान लिया।
लगभग 35 वर्षों तक स्वामी विरजानंद जी के निर्देशन में उन्होंने समस्त वेदों व उपनिषदों का अध्ययन किया। अपनी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण होने के उपरांत वे गुरू के आदेशानुसार देश में फैली अज्ञानता को  दूर करने के उद्येश्य से परिभ्रमण करने लगें अपने देश-भ्रमण के दौरान ही उन्होंने ‘आर्य-समाज’ की स्थापना की।
समाज से अज्ञानता, रूढिवादिता व अंधविश्वास को मिटाने हेतु उन्होंने धर्मग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना की । ‘वेदांग प्रकाश’, ‘ऋग्वेद भूमिका’ तथा -व्यवहार भानु’ स्वामी जी के अन्य श्रेष्ठ ग्रंथ हैं। उनके ग्रंथों के अध्ययन से  यह पता चलता है कि उन्हें प्राचीन भारत की संस्कृति से अटूट लगाव था।
स्वामी जी ने मन, वचन व कर्म तीनों शक्तियों से समाजोद्धार के लिए प्रयत्न किया। अपनी रचनाओं व उपदेशों के माध्यम से भारतीय जनमानस को मानसिक दासत्व से मुक्त कराने की पूर्ण चेष्टा की । उनकी वाणी इतनी अधिक प्रभावी व ओजमयी थी कि श्रोता के अंतर्मन को सीधे प्रभावित करती थी। उनमें देश-प्रेम व राष्ट्रीय भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी।
समाजोत्थान की दिशा में उनके द्वारा किए गए प्रयास अविस्मरणीय हैं। समाज में व्याप्त बाल-विवाह जैसी कुरीतियों का उन्होंने खुले शब्दों में विरोध किया। उनके अनुसार बाल-विवाह शक्तिहीनता के मूल कारणों में से एक है। इसके अतिरिक्त वे विधवा-विवाह के भी समर्थक थे।
स्वामी दयानंद सरस्ती जी को अपनी मातृभाषा हिंदी से विशेष लगाव था। उन्होंने उस समय हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने हेतु पूर्ण चेष्टा की । उनके प्रयासों से हिंदी के अतिरिक्त वैदिक धर्म व संस्कृत भाषा को भी समाज में विशेष स्थान प्राप्त हुआ।
दयानंद विद्यालय व विश्वविद्यालयों ने वैदिक धर्म व हिंदी भाषा के प्रचार - प्रसार में विशेष योगदान दिया। वे ‘आर्य समाज’ के संस्थापक थे जिसकी हजारों की संख्या में शाखाएँ देश-विदेशों में आज भी फैली हुई हैं तथा भारतीय संस्कृति व सभ्यता के विकास में महात्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती एक युग पुरूष थे। उनका संपूर्ण जीवन तप और साधना पर आधारित था। उन्होंने वैदिक धर्म व संस्कृति के उत्थान के लिए जीवन पर्यंत प्रयास किया। विदेशी दासत्व से भारतीय जनमानस को मुक्त कराने हेतु उनका प्रयास सदैव स्मरणीय रहेगा। हिंदी भाषा को मान्यता व सम्मान प्रदान करने हेतु उनके प्रयासों को राष्ट्र कभी भी भुला नहीं पाएगा।
62 वर्ष की आयु में स्वामी जी दिवंगत हो गए। उन्हें धोखे से विष पिला दिया गया था, मगर इस महान आत्मा ने विषपान कराने वाले व्यक्ति को हृदय से माफ कर दिया। उनके द्वारा रचित महान् ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ आज भी संपूर्ण आर्य जनमानस का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। इसमें वैदिक धर्म की उच्चता का सविस्तार प्रश्नोत्तर रूप में वर्णन किया गया है । वैदिक धर्म अन्य सभी धर्माें से उन्नतिशील क्यों है, इस ग्रंथ में इस संबंध में बेबाक टिप्पणी की गई है।
 
आचार्य चाणक्य
कुटिल गोत्रोत्पन्न आचार्य चणक ने अपने पुत्र का नाम विष्णुगुप्त रखा था। कालान्तर में चणक आचार्य के पुत्र विष्णुगुप्त चाणक्य नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका समय 322 या 325 वर्ष का माना जाता है। इनका जन्म मगधसाम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र में हुआ था। तत्कालीन मगधसम्राट धनान्द्र के अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाने के कारण आचार्य चणक ाके राजबन्दी बना लिया गया वही इनकी मृत्यु हो गई। कुछ दिनों पश्चात् इनके माताजी के भी देहान्त के उपरान्त विष्णुगुप्त तक्षशिला में आ गए। वहीं अर्थशास्त्र विषय का अध्ययन कर आचार्य बने। उस समय तक्षशिला विश्व का सर्वश्रेष्ठ विद्याकेन्द्र के रूप में विकसित था। यहाँ एशिया, यूरोप एवं आफिकी महाद्वीपों से छात्र अध्ययननार्थ आया करते थे।
सिकन्दर के आक्रमण के पूर्व भारत छोटे-छोटे गणराज्यों में विभक्त था। विश्व विजेता बनने की ईच्छा से सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया। मगधसम्राट से सिकन्दर के विरूद्ध सामरिक सहाय की याचना करने पर घमण्ड में चूर धनानन्द ने आचार्य का अपमान किया था। उसी अत्याचारी सम्राट् को पतच्यु करने तक अपनी शिखा में गांठ नहीं लगाउंगा की प्रतिज्ञा आपने की थी । नन्दवंश का विनाश पर चन्द्रगुप्त को गन्धार से लेके समस्त उतरापथ और दक्षिण में सिन्धुतट तक महान् चक्रवर्ती राज्य का सम्राट् आपने बना दिया था।
इतने बडे साम्राज्य का महामन्त्री होने पर भी आपका रहन - सहन विरक्त साधुओं जैसा ही था। मुद्राराक्षस नाटक के एक श्लोक के अनुसार उनके जीर्ण - शीर्ण कुटियानुमा झोंपडे में एक और गोबर के उपलों को तोडने के लिए एक पत्थर रखा था। दूसरी और शिष्यों द्वारा लाई गई कुशा (घास) का ढेर रखा था। छत पर समिधाएं सूखने के लिए डाली गई थी, जिसके भार से छत झुक गई थी।
आचार्य चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ एवं कूटनीतिज्ञ थे। राजनीति में साम, दाम, दण्ड, भेद नीति के समर्थक थे। वे एक चतुर चिकित्सक तथा रसायन शास्त्र के ज्ञाता थे ।  अर्थशास्त्र में अनेक रासायनिक शस्त्रों के निर्माण एवं प्रयोग विधिदेखने तथा रसायनशास्त्र के ज्ञाता थे। अर्थशास्त्र में अनेक रासायनिक शस्त्रों के निर्माण एवें प्रयोग विधिदेखने को मिलती है। इन शस्त्रों के द्वारा अग्निकाण्ड, मुर्छा, जागरण, निद्रा, आलस्य, उन्माद, और भ्रमादि उत्पन्न किए जा सकते हैं।
आचार्य चाणक्य द्वारा लिखित साहित्य में कोटेलीय सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके अलावा 2 वृद्धचाणक्य 3 चाणकय नीतिशास्त्र 4 लघुचाणक्य 5 चाणकय राजनीतिशास्त्र आदि ग्रन्थों की आपने रचना की है। आज भी आचार्य द्वारा लिखित ग्रन्थ कौटलीय अर्थशास्त्र राजनीति विषय की विष्व श्रेष्ठ पुस्तक है। 
ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकर, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करती योग्य है।
 
चन्द्रशेखर वेंकटरमन
रमन का जन्म नवम्बर 1888 में तमिलनाडु के त्रिचिनापल्ली नामक नगर में हुआ था। आपके पिता
एक अध्यापक थे । आपकी माता का नाम पार्वती अ्ययर था। आपका प्राथमिक अभ्यास विशाखापट्टनम् में हुआ। यहां आपके पिताश्री भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक थे।
रमन बचपन से ही अति बुद्धिमान् विद्यार्थी थे । 12 वर्ष की छोटी अवस्था में ही आपने मेट्रिक की परीक्षा पास कर दी थी। सन 1904 में आपने एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इस हेतु आपको अणीसुवणर््चन्द्रक द्वारा सम्मानित किया गया था।
मात्र 16 वर्ष की अवस्था में लिखा गया आपका लेख लन्दन से प्रकाशित ‘फिलोसोफिकल मैगझिन’ में प्रकाशित हुआ था। तत्पाश्चात् आप विश्व के सुविख्यात वैज्ञानिकों के सम्पर्क में आ गए। एम. ए. होने के पूर्व आपके दो लेख अन्तराष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में प्रकाशित हो गए थे। अब गणित के विषय में आपकी रूचि बढ गई । आपने लोर्ड रेले नामक वैज्ञानिक के सिद्धान्त को माना था।
आपने उसे अन्य स्वरूप में प्रस्तुत करते हुए उनमें स्थित खामियों का समाधान भी ढूंढ लिया जिसे लोर्ड रेले ने भी मान्य किया था।
सन् 1906 में आपने वित्त विभाग की परीक्षा पास की और उसके अधिकारी बन गए। परन्तु डॉ. अमृतलाल सरकार के साथ आपका शोधकार्ता चलता रहा। कोलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति सर आशुतोष मुखर्जी ने आपको भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक पद का प्रस्ताव दिया जिसे रमन जी स्वीकार करते हुए विज्ञान के लिए समर्पित हो गए।
रमन का सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक शोधरमन प्रभाव है जिसकी शुरूआत 1921 में उनके विदेशयात्रा के समय तब हुई जब आपका जहाज भूमध्य सागर से जा रहा था। 1921 से 1928 तक रमन अपने शोधकार्य में लगे रहे। आपने प्रमाणित किया कि भिन्न-भिन्न पदार्थों द्वारा रमन-रंग कहा इस सिद्धान्त का रंगों को आपने रमन रंग कहा। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन आपने मर्क्युरी लैम्प के प्रकाश के प्रयोग के आधार पर किया। इस शोधपर रमन को सन 1930 में भौतिक विज्ञान का नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ।
भौतिक विज्ञान का नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। भौतिक विज्ञान में इस पुरस्कार को पानेवाले एशिया में आप प्रथम व्यक्ति थे। यह भारत के लिए। गौरव की बात है।
इस शोधपर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने आपको सर की उपाधी से सन्मानित किया। रमन प्रभाव के आविष्कृत होते ही विश्वभर के करीब हजार वैज्ञानिक इस विषय पर शोधकार्य में लग लए । रमन ने इस सिद्धान्त द्वारा यह प्रतिपादित किया कि जब भिन्न-भिन्न  वस्तुओं द्वारा प्रकाश को विभाजित किया जाएगा तब पटल पर प्रकाश की रेखाएं भी भिन्न - भिन्न ही होगी । सोविएट सरकार ने रमन को ‘लेनिन पुरस्कार’ से सन्मानित किया था। सन् 1934 में रमन ने बैगलोर में भारतीय विज्ञान अकादमी की स्थपना की सन् 1948 में स्थापित रमन अनुसंधान संस्थान (बैंगलोर)  के माध्यम से आप आजीवन कार्य करते रहे। अपने भिन्न भिन्न वाद्ययन्त्रों जेसे वीणा, मृदुंग, तबला, वायोलिन आदि के ध्वनियों का अभ्यास करके उन पर सूक्ष्म वेचन करते हुए अनेक परीक्षण किए। आप विज्ञान विषयक लेखन कार्यकाल में भी कुशल थे। आपने अनेक पत्र - पत्रिकाएं प्रकाशित कीं। र्झण्डियन अकादमी ओफ सायन्सीझ तथा र्झण्यिन जनरल ओफ फिजिक्स की नींव भी आपने ही डाली। विज्ञान के विषय में रमन का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि आपने विज्ञान सम्बन्धी अनेक संस्थाओं का अध्ययन अध्यापन हेतु सहायता प्रदान की। सन 1943 आपने रमन र्झन्स्टिटयूट की स्थापना की । यह संस्था डॉ. सी. वी. रमन के स्वप्नों का साकार कर रही है।
 
वराहमिहिर
वराहमिहिर का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जयिनी नामक नगर में हुआ था। आपका जन्मकाल सन् 499 अर्थात् वि.स..  556 से आस-पास होने का अनुमान किया जाता है। आपके पिता आदित्यदास तथा माता सत्यवती थी। सम्राट विक्रमादित्य आपके ज्योतिष् ज्ञान से अत्यन्त प्रभावित थे। यही कारण है। सम्राट ने अपने दरबार में नवरत्नों में उन्हें स्थान दिया था। इनके अलावा विक्रमादित्य के नवरत्नों में कालिदास, वैतालभट्ट, धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, घरखर्पक, वररूचि एवं शंकु थे।
वराहमिहिर महान् गणितज्ञ आर्यभट्ट के समकालीन उनसे 24 वर्ष छोटे थे। आपने ज्योतिष के क्ष्ेात्र में अनेक नए शोधकिए। आपने ज्योतिष के अनेक ग्रन्थों की रचना रचना भी की थी। आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ पंच सिद्धान्त है। ज्योतिष विषय के इस ग्रन्थ में वराहमिहिर ने ज्योतिष के प्राचीन सिद्धान्तों के महत्व के साथ साथ नए शोधविषय भी प्रतिपादित के साथ साथ नए शोधविषय भी प्रतिपादित किए है । 562 वि. सं. अर्थात सन 505 में इस ग्रन्थ की रचना हुई होगी ऐसा माना जाता है। 
वराहमिहिर ज्यातिष के साथ साथ खगोल विज्ञान के भी विद्धान थे। इस शास्त्र को आज कल एस्ट्रोनोमी कहा जाता है पंचसिद्धान्त के प्रथम भाग में खगोल विज्ञान पर विस्तार से प्रकाश डाला गया हैं।
वराहमिहिर ने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया था। कि पृथ्वी का आकार गोल है। वराहमिहिर के समय में भारत और यूनान के बीच में धनिष्ठ मैत्री थी। यूनान के लोग विज्ञान में बहुत ही प्रगति कर रहे थे। क्योंकि वराहमिहिर जिझासु और अभ्यासशील थे इसलिए उन्होने यूनानी संस्कृति तथा ज्योतिष का गहराई से अध्ययन किया। आप यूनानी विद्धानों के विषय में लिखते है यूनानी लोग आदरपात्र हे, कारण कि वे हम सबसे आगे है और विज्ञान में बहुत ही आगे हैं।
पन्चसिद्धान्त के अलावा भी आपके दो महत्तवपूर्ण ग्रन्थ वृहद् जातक तथा वृहत संहिता है। इस ग्रन्थों में भौतिकशास्त्र, भूगोल, नक्षत्रविद्या, वनस्पतिविज्ञान, प्राणिशास्त्र आदि के साथ-साथ तात्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, परस्थितियों का वर्णन भी मिलता है। इन ग्रन्थों द्वारा हमें प्राचीन भारत के वैज्ञानिक शोधों के विषय में जानने को मिलता है।
वराहमिहिर का वनस्पतिशास्त्र पर भी अदभुत प्रभुत्व था। आपने पौधों पर होनेवाले रोगों और उनकी रोकथाम के क्षेत्र में बहुत बडा कर्या किया है। गुप्त काल के इन ज्योतिषों (वराहमिहिर, आर्यभटट, ब्रह्मगुप्त) ने यह जान लिया था कि  ग्रह उपग्रह आदि नक्षत्रों से परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं। इतना ही नहीं पृथ्वी की अपनी धुरी पर धूमने की दैनिक गति को भी ये जानते थे।
हे मांसाहारियों ! तुम लोग जब कुछ काल के पश्चात् पशु न मिलेंगे, वब मनुष्यों का मांस भी छोडोंगे वा नहीं ?
 
महर्षि सुश्रुत
शल्यक्रिया के क्षेत्र में सबेस आगे सुश्रुत का नाम है। आप एक प्रसिद्ध व कुशल शल्य चिकित्सक थे। शल्य का शाब्दिक अर्थ है। शरीर की पीडा। इस पीडा या दर्द का निवारण करना ही शल्य चिकित्सा कही जाती है। अंाग्ल भाषा मं उसे सर्जरी अथवा ओपरेशन भी कहते है सामान्यतः यह भ्रम है कि शल्यक्रिया का प्रारम्भ युरोप में हुआ था। परन्तु भारत देश में तो यह प्राचीन काल से ही अत्यन्त विकसित रूप में विद्यमान रही है।
शल्यक्रिया का ज्ञान वैसे तो पुरातन काल से ही मानव को था। परन्तु वह विकसित अवस्था में न होने के कारण अत्यन्त पीडादायक प्रक्रिया के रूप में था। उसमें मरण सम्भावना भी अधिक मात्रा में थी। सुश्रुत ही ऐेसे प्रथम चिकित्सक थे जिन्होंने शल्यक्रिया को एक व्यवस्थित स्वरूप दिया। आपने इस विद्या का परिष्कार करके अनेकों मनुष्यों को स्वास्थ्य लाभ देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सुश्रुत महान ऋषि विश्वामित्र के वंशज थे। ऋषि विश्वामित्र भी एक वैज्ञानिक थे। सुश्रुत द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ सुश्रुत संहिता के लिए कहा जाता है कि इस ग्रन्थ में स्वर्ग के देवताओं द्वारा पूजे जानेवाले वैद्यराज धन्वन्तरी के उन उपदेशों का संग्रह है जो उन्होंने सुश्रुत को दिए थे। शल्यचिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुतसंहिता को आज भी प्रमाणभूत माना जाता है।
प्लास्टिक सर्जरी को आज-कल चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धिमानी जाती है। अमेरिका के वैज्ञानिक इसका श्रेय लेते हैं। परन्तु सुश्रुत ने अपने इस ग्रन्थ में प्लास्टिक सर्जरी का उल्लेख सैकडों वर्षों पूर्वे ही कर दिया था । इस पद्धति में नाक , कान, ओठ अथवा चेहरे की सुन्दरता बढाने के लिए। उस उस स्थान का मांस दूर करके शरीर के ही किसी भाग का मांस लगाकर उसे सुन्दर रूप दिया जाता है इस पद्धति का आधार लेकर ही प्राचीन काल के लोग अपना रूप लेते थे। सुश्रुत की इस पद्धति का अनुसरण युरोप ने किया। आज विश्वभर में यह पद्धति प्रचलित है।
सुश्रुत सुहिता को समय ईसा पूर्व 600 वर्ष का माना जाता है। यह ग्रन्थ मूल संस्कृत भाषा में लिखा गया था। इसा की प्रथम शताब्दि अर्थात् वि.सं. 57 के आसपास सुप्रसिद्ध रसायनवेता नागार्जुन ने उसे पुनः सम्पादित कर नया ही स्वरूप दिया था। महर्षि सुश्रुत अपने विद्यार्थियों को प्रयोग तथा क्रियाविधि से पढाते थे। आप चीरफाड का प्रारम्भिक अभ्यास शाकभाजी और फलो पर कराते थे। इस अभ्यास के पूर्ण हो जाने पर मृत शरीरों पर अभ्यास कराया जाता है वे स्वयं शवों पर ओपरेशन कर दिखाते तथा वहीं विद्यार्थीयों से भी अभ्यास कराते थे। आपने शल्यचिकित्सा के लिए एक सौ से भी अधिक यन्त्रों एवं औजारों का आविष्कार किया।
सुश्रुत संहिता में भिन्न भिन्न प्रकार के वनस्पतियों का  भी विश्लेषण करके उसका विस्तार से वर्णन किया है। महर्षि सुश्रुत का मानना था कि चिकित्सक को सैद्धान्तिक और किताबी ज्ञान के स्थान पर प्रयोगात्क ज्ञान मेें कुशल होना चाहिए।
 
महर्षि कपिल
महर्षि कपिल के पिता कर्दम ऋषि थे । आपकी माता का नाम मनुपुत्री देवहूति था। महर्षि कपिल का जन्म आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व का माना जाता है । आप महान तेजस्वी ऋषि थे । बौद्ध सम्प्रदायियों के अनुसार महर्षि कपिल गौतम ऋषि के वंशज थे। आपके मुख्य शिष्य का नाम आसुरि था। इसका प्रमाण स्वरूप श्लोक है - 
पत्र्चमः कपिलो नामसिद्धेशः काल विलुप्तम् । प्रोवाचसुरये सांख्यं तत्वग्रामविनिर्णयम् ।।
इसका अर्थ है - काल में विलप्त हो गए संाख्यशास्त्र का उपदेश महर्षि कपिल ने ही सांख्य के सुप्रसिद्ध आचार्य आसुरि का दिया था । आचार्य आसुरि के शिष्य पंचशिख हुए । पंचशिखा के पास से ऋषि जैगीश्रव्य ने शिष्यत्व ग्रहण किया था आचार्यों ने सांख्यदर्शन केा प्रचार प्रसार किया। महर्षि कपिल के मूल ग्रन्थ का नाम षष्टितन्त्र था आपके शिष्य पंचशिख तथा वार्षगण्य ने इस ग्रन्थ पर माष्य लिखे और उसकी व्याख्या की ।
सांख्य दर्शन के माध्यम से महर्षि ने प्रथम बार आत्मा, अनात्मा तथा भौतिकवाद के सूक्ष्म तत्वों केा विस्तृत एवं गंभीर विवेचन प्रस्तुत किया। आपके मत में मूलभूत दो प्रकार के अनादि तत्व है प्रकृति एवं पुरूष । पुरूष से आत्मा एवं परमात्मा दोनों का ग्रहण होने से मूलभूत अनादि तत्व तीन प्रकार के हुए। प्रकृति भी सत्य , राज एवं तम इन तीन गुणों के समुदाय का नाम है। आगे पांच तन्मात्राओं से पांच स्थूल भूत उत्पन्न 16 पदार्र्थाें ,5 तन्मात्राएं तथा 11 ईन्द्रियां उतपन्न होती हैं आगे पांच तन्मात्राओं से पांच स्थूल भूत उत्पन्न होते है। प्रकृति अनुत्पत्रा है। महतत्व से स्थूलभूतों की रचना को विकृति कहते हैं पुरूष प्रकृति (परमात्मा) का ज्ञान होता है तब वह समस्त दुखों एवं बन्धनों  से मुक्त होकर मुक्ति सुख को भोगता है।
बौद्ध दर्शन असत् में से सत् की उत्पत्ति मानता है। परन्तु सांख्य ने घोषित किया कि सत से असत की उत्पत्ति कभी नहीं होती है इसी प्रकार असत से भी सत की उत्पति नहीं हो सकती है। सत्तात्मक कारण द्रव्य से ही कार्य जगत की उत्पति होती है। आधुनिक विज्ञान का भी यही सूत्र है कि शून्य से तो शून्य ही उत्पन्न होगा । मल पदार्थ का कभी नाश नहीं होता । 
महर्षि कपिल दार्शनिक होनेके साथ साथ वैज्ञानिक भी थे। आपने ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति तथा निष्क्रिय उर्जाशक्ति की उपस्थिति को स्पष्ट किया। आप के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का आध्ुानिक  वैज्ञानिकों ने भी मान्यता दी हैे।
 
भास्करचार्य का जन्म वि.सं. 1114 में हुआ था। कुछ लोग आपका जन्म स्थान कर्नाटक का बीजापुर मानते हैं तथा कुछ  लोग बिज्जडित नामक ग्राम जो वर्तमान में महाराष्ट्र का जलगांव नामक जिला है मानते हैं भास्करचार्य के पिता का नाम महेश्वर था। वे गणित के प्रकांड पण्डित थे।
गुरूत्वाकर्षण के सिद्धान्त का सार यह है कि पृथ्वी अपनी आकार्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु को अपनी और खींचती है। इस सिद्धान्त को खोजने का श्रेय आधुनिक वैज्ञानिक न्यूटन को दिया जाता हैं न्यूटन ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन सन् 1668 में किया था। परन्तु भास्कराचार्य ने उनसे भी 500 वर्ष पूर्व इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।
भास्कराचार्य की ख्याति एक महान् गणितज्ञ और खगोल वैज्ञानिक के रूप में हुई थी । आपका मुख्य ग्रन्थ लीलावती गणित के क्षेत्र में एक महान सिद्धि मानी जाता है। लीलावती आपकी पुत्री का नाम था, जिसे आप अत्यधिक चाहते । इसलिए आपने इसे ग्रन्थ को अपनी पुत्री का नाम दिया है। लीलावती छन्द्रों में लिखित प्रद्यात्मक ग्रन्थ है। पद्य में होने से उसे पढने और स्मरण रखने में अनुकूलता होती ळै। इस  ग्रन्थ की लोकप्रियता एवं उसके महत्व का अनुमान इस बात से हो सकता है कि अनेक विदेशी भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। लीलावती में भास्कराचार्य ने दश गुणोत्तर प्रणाली का प्रयोग किया है। उसमें गणित की सामान्य विधियों का मनोरंजक रूप में समझाया गया है। जोड, घटाना, गुणा, भाग, वर्गमूल आदि के अलावा इस ग्रन्थ में अनेक उपयोगी प्रश्नों की भी समाधान दिया गया है।
आपके लिखें हुए दो ग्रन्थ विशेष प्रसिद्ध हुए। प्रथम है सिद्धान्त शिरोमणि तथा द्वितीय है सूर्यसिद्धान्त सिद्धान्त शिरोमणि चार विभागो में है। ये चार विभाग
(1) लीलावती (2)बीज गणित (3)गणिताध्याय (4)गोलाध्याय नाम से जाने जाते हैं।
भास्कराचार्य गणितज्ञ होने के साथ साथ एक महान ज्योतिषी भी थे। हम जानते है कि उनके समय में दूरबीन की खोज नहीं हुई थी, पुनरपि ग्रह, नक्षत्रों आदि का अध्ययन , उनकी स्थिति का परिज्ञान उन्होंने कैसे किया होगा यह आश्यर्च का विषय है। तारामण्डल के अभ्यास में आप भोजन या विश्राम को भी भूल जाते थे।
भास्कराचार्य एक महान् खगोलशास्त्री भी थे। खगोल विज्ञान के क्षेत्र में आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ कर्ण कुतूहल है। इस ग्रन्थ में ज्योतिष सम्बन्धी सारणियों और गिनतियों में किए हुए कार्यों का वर्णन है। गणित की रचना की जा बाद में विश्व प्रसिद्ध हुए।
 
आर्यभट्ट
आर्यभट्ट का जन्म वि.सं. 533 अथार्त् सन् 476 में हुआ था। यह समय भारत का सुवर्णयुग था। मगधशासक गुप्त साम्राज्य के निद्रर्शन में समग्र भारत बहुमुखी प्रगति में विश्व में सबसे अग्र स्थान पर था।
आर्यभटट का जन्म स्थान पटना अर्थात प्राचीन कालीन मगधकी राजधानी पाटलीपुत्र के समीप कुसुमपुर नामक ग्राम था। आर्यभटट सुप्रसिद्ध गणितज्ञ तथा प्रखर ज्योतिषी थे। खगोल विज्ञान पर भी आपका प्रभुत्व था।
आर्यभटट के सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ का नाम आर्यभटटीय है। इस ग्रन्थ की रचना आपने वि.सं. 556 (ई.सन. 499) में की । यह ग्रन्थ छन्दोबद्ध है और चार विभागों में विभक्त है। यह ग्रन्थ सूत्रशैली में है। किसी सिद्धान्त को अत्यन्त संक्षेप में प्रतिपादन करना सुत्रशैली कहाती हैै।
इसे हम गागर में सागर की उपमा देते है। उदाहरण के लिए एक ही श्लोक में गणित के पांच नियमों का समावेश हो जाता है। आर्यभटट के चतुर्थ विभाग का नाम गोलपाद है उसमें केवल 11 ही श्लोक हैं किन्तु उन 11 श्लोको में सम्पूर्ण सूर्य सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया है।
आर्यभटट त्रिकोणमिति के भी आविष्कर्ता थे। आपने त्रिकोणमिति के अनेक सूत्रों का संशोधन किया है। आपने ग्रन्थ आर्यभटट में प्रथम बार त्रिकोणमिति का उल्लेख मिलता है। आर्यभटट प्रथम व्यक्ति थे जिन्होने गणित में पाई का प्रयोग किया । आपने ही सर्वप्रथम सारणियों का प्रयोग किया। आपके द्वारा प्रतिपादित  सूत्र और नियम वर्तमान में गणित के पाठयक्रम में पढाए जाते हैं।
आर्यभटट ने ही प्रथम बार दिखाया कि पृथ्वी का आकार गोल है और वह अपने धुरी पर चक्कर लगाती है। आपने नक्षत्रों के परिभ्रमण का भी विवेचन किया है आने सूर्य सिद्धान्त नामक ग्रन्थ में ग्रहण के कारणों का सूक्ष़्म विवेचन करते हुए ऐसा स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण राहु और केतु नामक राक्षसों द्वारा ग्रसित होने से नहीं अपितु चन्द्रमा अथवा पृथ्वी की छाया का परिणाम है।
आपने जो वर्षमान निश्चय किया है वह युनानी ज्योतिषी टालमी द्वारा निश्चित किए हुए काल की अपेक्षा स्पष्ट है। आर्यभटट की गिनती अनुसार वर्ष में 365. 2586805 दिवस होते हैं। इससे स्पष्ट होते हैं कि अन्य देशों के ज्योतिषियों की अपेक्षा आर्यभटट की गिनती आधुनिक कालगणना के साथे सार्वाधिक साम्य रखती है। आर्यभटट का ज्योतिष - विज्ञान पर भी पूर्ण प्रभुत्व था। आप स्वयं भी एक विद्धान ज्योतिषी थे। आपने ज्योतिष - गणित और अंकगणित का समन्वय किया। आपने गणित के ऐसे सूत्र दिए जिनसे त्रिकोण का क्षेत्रफल, वृत्त , शंकु, गोलाकार आदि के क्षेत्रफल सरलता से जाने सकते हैं।
आर्यभटट द्वारा किए गए समग्र शोधका वर्णन (1) आर्यभटटीय (2) दंशगीतिका (3)तन्त्र आदि ग्रन्थों में मिलता है। महान ज्योतिषी तथा गणितज्ञ आर्यभटट की प्रसिद्धि भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी है।
 
नागार्जुन
प्राचीन भारत ने गणित तथा ज्योतिष के क्षेत्रों में नए-नए संशोधन करके विश्व की ज्ञान सम्पदा में अभिवृद्धि करके उसे समृद्ध बनाया है। इतना ही नहीं अपितु रसायन शास्त्र जैसे अत्यन्त आधुनिक क्षेत्र में भी अभूतपूर्व योगदान प्रदान किया है। नागार्जुन ऐसे ही एक प्रसिद्ध रसायन शास्त्री थे।
छत्तीसगढ के रायपुर जिले में पैरी नदी के तट पर बसे बालूका ग्राम में नागार्जुन का जन्म हुआ था। सातपुडा की सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं कीह तलहटी में स्थित यह बालु का ग्राम नागार्जुन की जन्मभूमि था। आपके पिता कौंडिल्य गोत्र में जन्में हुए दक्षिणात्य ब्राह्मण थे। वे अत्यन्त सात्विक शिवभक्त एवं कर्मकाण्डी सज्जन थे।
बालक नागार्जुन जन्म से ही अत्यन्त प्रभावशाली था। इसलिए अतीत शीध्रता से अपने वेद-वेदांगों का अभ्यास पूर्ण कर लिया। बडे होकर आप श्रीपुर- जो वर्तमान में सिरपुर का नाम मात्र गांव ही रह गया है के विद्यालय में अभ्यास करने गए थे। यह बात वि.सं. 57 अर्थात् ईसा की प्रथम सताब्दि की है। उस समय सिरपुर महाकौशल की राजधनी थी। धन-धान्य से समृद्ध इस नगर में एक विश्वविद्यालय भी था, जहां देश-विदेश के विद्यार्थी अभ्यास करने आते थे। नागार्जुन ने यहां बौद्ध धर्म का अभ्यास किया और बौद्ध धर्म की दीक्षा भी ली । आपकी प्रभावशाली प्रतिभा के कारण इसी विश्वविद्यालय में अभ्यास पूर्ण करने लगे। इस समय में महाकौशल में भयंकर अकाल पडा। बारह वर्षों तक वर्षा न होने के कारण प्रजा भूख से मरने लगी । तब यहां के राजा आर्यदेवने नागार्जुन से इस समस्या को हल करेन के लिए सुझाव मंागा था। क्योंकि नागार्जुन रसायनशास्त्री थे, आपने इस समस्या पर गम्भीरता पूर्वक विचार करना प्रारम्भ किया। आप कुछ दिनों के लिए एकान्तवास में चले गए। एकान्तवास के कुछ दिनों पश्चात् आपने राजा को संदेश भिजवाया कि उनके राज्य में जितना तांबा ईकटढा हेा सकता है उसे वे आश्रम में भेज दें। राजा ने नागार्जुन ने जब राजा राजा को आश्रम में बुलाया तब आपके समक्ष सोने का विशाल ढेर हो गया था। नागार्जुन ने राजा को कहा कि वे इस सोने को ले जाकर अन्य देशों मेें बेचकर अन्न खरीदकर प्रजा मं बांटने का कार्य करें । इस प्रकार नागार्जुन ने रासायनशास्त्र की अपनी विशेषता के आधार पर भीषण अकाल की समस्या का समाधान किया।
 
यह तो निश्चित है कि नागार्जुन एक महान वैज्ञानिक थे। आपने अनेक भिन्न श्रेणी के धातुओं को सोने में परिवर्तन करेन की पद्धति का संशोधन किया था। आपके रचे हुए रसहृदय नामक ग्रंथ मं इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।
नागार्जुन ने आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत रचित सुश्रुतसंहिता का संपादन कर उसमें नए अध्याय बढाए थे। आपके रसायन शास्त्र के क्षेत्र में रचित ग्रंथ इस प्रकार है (1) रस हृदय (2)रस रत्नाकर  (3)रसेन्द्र मंगल । चिकित्सा के क्षेत्र में भी आपका योगदान उल्लेखनीय है। इस क्षेत्र में आपके मुख्य ग्रंथ इस प्रकार है (1)आरोग्य मंजरी  (2)कक्ष कन्नतंत्र (3)योगाष्टक । आपने पारे का अष्किार किया । उसमें भस्म बनानें की पद्धति को भी ढूंढ लियां आप मानते दार्शनिक भी थे। आपका दर्शन शून्यवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आपने वैदिक और बौद्ध दर्शन में समन्वय करने का भी प्रयास किया है।
 
जगदीश चन्द्र बोस
प्राणियों में नहीं अपितु बनस्पति में भी जीव है, यह सिद्ध करने बाले महान भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस का जन्म 20 नवम्बर 1858 में ढाका समीप मयमनसिंह नामक नगर में हुआ था। वर्तमान में ढाका बांग्लादेश की राजधानी है।
जगदीश चन्द्र बोस के पिताजी भगवान चन्द्र डेप्युटी मेजिस्टेªट थे। आपकी माता वामसंुदरी
एक ईश्वरपरायण और धार्मिक महिला थी। 
जगदीश चन्द्र को बचपन से ही पदार्थ विज्ञान के साथ साथ संस्कृत साहित्य में ीाी गहन रूचि थी। आपने कोलकत्ता की सेन्ट जेवियर्स कॉलेज से बीे.ए. की परीक्षा पास की थी । उसके बाद आप केम्ब्रिज युनिवर्सिटी में अभ्यास हेतु ईग्लैण्ड गए । वहां से सन् 1884 ई में बी.एस.सी.की.डिग्री प्राप्त की और भौतिक शास्त्र पर कार्य किया। 
सन 19885 ई. में जगदीश चन्द्र कोलकत्ता की प्रेसिडेन्सी कालिज में पदार्थ विज्ञान के अध्यापक बने। सन 1890 ई. में आपने पेरिस में आयोजित पदार्थ वैज्ञानिकों के सम्मेलन में भाग लिया।
आपने प्रेसिडेन्सी कालेज मं अध्ययन कार्य करते हुए एक ऐसा यन्त्र तैयार किया जिसकी सहायता से 2.5 से 0.5 से.मी. के अत्यन्त सूक्ष्म परिणाम विद्युत तरंगो का निर्माण किया जा सके। आपने इस विद्युत को विधूकिरण के उदगम से दूर पकड सके ऐसा ग्राहक यन्त्र की सहायता से बिना तार ही संदेश भेजना सम्भव हुआ। इस संशोधन के लिए आपको लन्दन विश्वविद्यालय की र्डाक्टर ओफ सायन्स की पदवी मिली।
जब जगदीश चन्द्र अपनी विद्युत सम्बन्धी शोधकर रहे थे। उसी समय ही आपके मने में विचार आया कि इस संशोधन का प्रयोग वनस्पति पर किया जाए। आपने यह सिद्ध किया कि वनस्पति में भी जीवन होता है और वे भी दुख या कष्ट दिए जाने पर पीडा से छटपटाते हैं। इसके लिए आपने मैग्नेटिक कोस्मोग्राफ नामक यन्त्र को बनाया। विश्व के वैज्ञानिकों ने भारतीय दर्शन के इस शाश्वत सत्य का विस्तार किया कि वनस्पति में जीवन होता है।
सन 1896 ई. में जगदीश चन्द्र बोस ने लिवरपुल में रोयल ईन्स्टिटयूट में वैज्ञानिकों के समक्ष अपने नवीनतम आष्किार पर प्रवचन दिया। सन् 1904 ई. में श्रीमती बुज की अर्जी के आधार पर आपका पेटन्ट स्वीकृत हुआ। आप इन सभी यन्त्रों के निर्माणकर्ताओं मं अग्रसर थे, जिनके द्वारा आधुनिक युग में फोटो वोल्टेक सेल की सहाय से इलेक्ट्रोनिक यन्त्रों का निर्माण हो रहा है।
1920 ई. में आप रोयल सोसायटी के सदस्य चुने  गए। 1922 ई. में लीग ओफ नेशन्स में आपका अन्तराष्ट्रीय ईन्सटेलेक्वयुअल र्कापरेटिव कमेटी के सदस्य बनाए  गए। 1925 ई. में जिनेवा में विश्वाप्रसिद्ध  वैज्ञानिक आइन्स्टाइन्स के साथ आपकी भेंट हुई । 1928 ई. में आप विएना में एकेडमी ओफ सायन्स के विदेश सचिव नियुक्त हुए।
सन् 1902  से 1907 ई. के ब्रीच प्राकशित हुए आपके मुख्य शोधग्रंथ है 1. लिविंग। 2.एंड र्नोन लिविंग 2.प्लाण्ड रिस्पोन्स 3.कम्परेटिव ईलेकट्रो साईकोलोजी। र्डा. जगदीश चन्द्र बोस ने अपना जीवन विज्ञान को समर्पित कर दिया। आपने सन् 1917 ई. में बसु विज्ञान मन्दिर का निर्माण कराया। सन् 1936 ई. में आपका स्वास्थ्य बिगडने लगा। अन्ततः 24 नवम्बर में भारतमाता के इस महान सपूत को कोल के क्रूर हाथों ने हमारे पास से छीन लिया। आपके नाम से भारत आज विश्व में गौरवान्वित है।
 
श्री निवास रामानुजम् 
आधुनिक गणितज्ञों में श्री निवास रामानुजम् का नाम समग्र विश्व में अत्यन्त आदर व श्रद्धा से लिया जाता है। आपका जन्म 22 दिसम्बर 1887 में तमिलनाडु के कुम्भकोमण ग्राम में हुआ था । आपके पिता श्रीनिवास आयंगर की अपनी कपडे की दुकान थी। आपकी माता कोलम्माल एक तेजस्वी बुद्धिमती धार्मिक स्त्री थी। आपकी दादी मां भी इनके साथ ही रहती थी और वह नामगिरि देवी की परमभक्त थी। आयंगर दम्पत्ति को विश्वास था कि नमागिरि देवी की कृपा से उनके वहां रामानुजम् का जन्म हुआ है।
पांच वर्ष की अवस्था में रामानुजम ने गांव की पाठशाला में प्रवेश लिया। दो वर्ष के बाद आपको कुम्भकोणम् टाउन हाईस्कूल में दाखिल किया गया। गणित की और रामानुजम को आरम्भ सी ही विशेष अभिरूचि थी । आप सदा एक प्रश्न का समाधान ढूंढते रहते थे कि गणित का सबसे बडा सत्य क्या है ?
रामानुजम की विलक्षण बुद्धि को देखकर आपके  शिक्षक भी अश्चिर्य चकित  हो जाया करते थे। अनेक बार वे भी अपने इस शिष्य के प्रश्नों के उत्तर देने में अपने आपके असमर्थ मानते थे।
 रामानुजम् की विलक्षण बुद्धि के कुछ उदाहरण अदभूत है। दसवीं कक्षा में पढते थे । तब ही आपने बी.ए की त्रिकोणमति का अभ्यास पूर्ण कर लिया था। ऐसा कहा जाता है कि पाश्चात्य गणितज्ञ लोनी द्वारा लिखित ट्रिगोनोमेट्री के गंथों का देखते ही आपने उन्हें आत्मसात् कर लिए थे। इस गंथ में आपने आवष्यक संशोधन भी किए।
नौकरी के लिए मद्रास की र्झण्डियन मैथेमेटिकल सोसायटी के उच्च अधिकारी श्री रामास्वामी ऐयर को मिले। रामासवामी ने प्रसिडेन्सी कोलेज के प्राफेसर श्री शेषु ऐयर के नाम एक पत्र लिखकर आपको दिया। श्री शेषु एयर ने आपको कायालय में लिखने के कार्य पर लगा दिया। कुछ ही दिनों में यह काम भी छूट गया। उसके बाद शेषु ऐयर ने नेल्लुर जिले के जिलाधीश श्री आर. रामचन्द्रन के नाम भी पत्र लिख दिया। वहां आपको पोर्ट ट्रस्ट में लिपिकार की नौकरी मिली। वेतन मासिक रू. 25 तय हुए। नौकरी मिली। वेतन मासिक रू. 25 तय हुए। नौकरी करते हुए भी गणित की साधना निरन्तर चलती रही। सन् 1911 ई. में रामानुजम्  का 14 पृष्ठ का शोधपत्र और 9 प्रश्न शोधपत्रिका में प्रकाशित हुए। परिणामस्वरूप रू. 75 की शिष्यवृत्ति आपको विश्वविद्यालय से मिलने लगी।
रामानुजम ने एक विश्व प्रसिद्ध गणित के प्राध्यापक श्री जी.एच.हार्डी और श्री जे.ई. लिटलवुड को लिखा। इस पत्र में रामनुजम ने गणित के स्वयं शोधकिए  हुए सूत्र लिखे थे। आपकी स्वमरणशक्ति और संख्या गिनती की शक्ति असाधारण थी। आप बीजगणित की योग्य समझ और अनन्त श्रेणी तक सहज रूप में उसका व्यवहार करने की क्षमता रखते थे । विश्व प्रसिद्ध महान गणितज्ञ प्रो. हार्डी ने आपके मृत्यु समय लिखा था रामानुजम को प्राप्त यश तथा आपके कार्य को मिली सर्वमान्यता अन्य किसी भारतीय को मिली होती तो आप बहुत ही खुश होते परन्तु सत्य यह है कि रामनुजम मात्र एक गणितज्ञ ही नहीं अपितु महान व्यक्ति थे। साधनों के अभाव की स्थिति में भी भाषण संघर्ष करते हुए एक सामान्य व्यक्ति किस प्रकार महानता के उच्च शिखर तक जा सकता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रामानुजम का जीवन था।
 
भगत सिंह
भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को हुआ था, उनके पिता भी था एक क्रांतिकारी थे। देशभक्ति तो उसके रक्त में प्रवाहित होती थी। भगत सिंह उनके परिवार के क्रांतिकारियों के बारे में सब कुछ जानते थे। तेरह वर्ष की उर्म  में, भगत सिंह ने स्कूल छोडा दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।
उस समय देश में एक ताकतवर विदेशी कपडा विरोधी आंदोलन चल रहा था। भगत सिंह ने भी इस आंदोलन में भाग लिया और केवल खादी पहनी थी। वह विदेशी कपडे इकटठा करने लगे और उन्हें जलाने लगे। भगत सिंह को अहिंसा और असहयोग आंदोलन में कोई विश्वास नहीं था। उनको ऐसा था की सशस्त्र क्रान्ति ही केवल स्वतंत्रता जीतने का व्यवहारिक तरीका है।
वह लाहौर चले गया और एक नवजुवान भारत सभ का निर्माण किया, जिसमें युवा भारतीयों को शामिल किया गया था। वहा एक युवा क्रंतिकारी चंद्रशेखर आजाद को मिले, जिसे वह एक महान बंधन का गठन करने के लिए पेश किया गये थे। इन सभी दिनों वह सिखों के एक नायक कहा गया था, वह अब एक राष्ट्रीय नायक बन गए।
फरवरी 1928 में साइमन कमीशन, भारत को कितना स्वतंत्रता और जिम्मेदारी तय करने के भारत के लोगों को दिया जा सकता है वह चकासने लॉज साइमन के नेतृत्व में भारत आए। लेकिन वहाँ समिति पर कोई भी भारतीय नहीं था, इसलिए लोगों ने इसका बहिष्कार करने का फैसला किया. जहाँ भी समिति गयी, लोगों ने काले झण्डे के साथ विरोध किया, ‘‘साइमन वापस जाओ ’चिल्लाके। लाला की मौत का बदला लेने के लिए, भगत सिंह और दो अन्य क्रांतिकारियों सुखदेव ओर राजगुरू ने सांडर्स को गोली मार दी। तीन दिन बाद दिल्ली विधानसभा हॉल में एक बम फेंकने के लिए सुखदेव और राजगुरू और भगत सिंह को गिरफ्तार किया गया था और मौत की सजा सुनाई गयी।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को 23 मार्च 1931 को नियत दिन से एक दिन पहले फांसी पर लटाक दिया गया। उनको ‘‘शहीद-ए-आजम’’ (शहीदों के राजा) का शीर्षक दिया गया है।
 

चरक महान आर्युवदाचार्थ थे। आप कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम के राजवैद्य थे। कनिष्क प्रथम का काल सन 200का है । आपका जन्म शल्यक्रिया के जनक महर्षि सुश्रुत तथा व्याकरणाचार्य महर्षि पतत्रजलि के भी पूर्व हुआ था । आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता है। इस ग्रन्थ मूल पाठ वैद्य अग्निवेश ने लिखा था। चरक जी ने उसमें संशोधन कर तथा उसमें नए प्रकरण जोड कर उसे अधिक उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाया ।

आपने आयुर्वेद के क्षेत्र में अनेक शोधकिए तथा अनेकों संशोधन आलेख लिखे, जो बादमें चरक संहिता नाम से प्रसिद्ध हुई । चरक संहिता मूल में संस्कृत भाषा में लिखी गई है । वर्तमान में उसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्धहोता है । आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी होने से इसे पाठयक्रम में भी स्थान दिया गया है ।

चरक संहिता के आठ विभाग है ।

(1) सूत्र स्थान (2) निदानस्थान (3) विमानस्थान (4) शारीरस्थान (5) इन्द्रियस्थान (6) चिकित्सास्थान (7) कल्पस्थान एवं  (8) सिद्धिस्थान

इन आठ विभागों में शरीर के भिन्न भिन्न अंगो की बनावट, वनस्पतियों के गुण तथा परिचय आदि का वर्णन है ।

महर्षि चरक की यह मान्यता थी कि एक चिकित्सक के लिए महज झनी या विद्धान होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसे दयालु और सदाचारी भी होना चाहिए । चिकित्सक बनने से पूर्व ली जानेवाली प्रतिज्ञाओं का उल्लेख चरक संहिता में मिलता है । वैदिक काल में इन प्रतिज्ञाओं का पालन करना सभी वैद्यों के लिए आवश्यक माना जाता था ।

चरक संहिता का अनुवाद अरबी तथा युरोपीय भाषाओं में भी हो चुका है । उन उन भाषाओं के विद्धानों ने इस ग्रन्थ पर टीकाएं भी लिखी हैं आयुर्वेद में महर्षि चरक अभूतपूर्व योगदान के लिए ही आपको आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के महान सम्राट की उपाधी से सन्मानित किया गया था ।

 

आचार्य भारद्वाज के पिता महर्षियों में श्रेष्ठ आचार्य बृहस्पति के पुत्र थे । आपकी माता का नाम ममता था । आचार्य बृहस्पति को देवताओें का गुरू माना जाता है ।

एक वैदिक मान्यता के अनुसार जमदग्नि, वसिष्ठ,भारद्वाज,गौतम, वामदेव और अत्रि ये सप्तर्षि है । ‘सप्तानुक्रमणि’ ग्रन्थ के रचयिता कात्यायन के मत में आचार्य भारद्वाज ऋग्वेद के छः मण्डलों के द्रष्टा थे । आप अनेक शास्त्रों के प्रवक्ता तथा उपदेशक भी थे । तैत्तिरीय ब्राह्मण की एक कथा के अनुसार आचार्य भारद्वाज दीर्धायु प्राप्त ऋषि थे । कहा जाता है कि आपका आयुष्य 300 वर्षों से भी अधिक था ।

आचार्य भारद्वाज द्वारा रचित अन्य ग्रन्थों में भारद्वाज शिक्षा भारद्वाज श्रौत, गृह्यसूत्र तथा अंशुमतन्त्र विशेष उल्लेखनीय है । आपको वृहद विमानशास्त्र, आकाश शास्त्र तथा वैमानिक कला सम्बन्धित ग्रन्थ यन्त्र सर्वस्व का प्रणेता भी माना जाता है । इसके अलावा आयुर्वेद पर भी महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की है । चरक संहिता में वर्णित वैद्यों के एक विशाल सम्मेलन में जिन महान् 11 आचार्यों ने भाग लिया था, उनमें आचार्य भारद्वाज जी का भी नाम है ।

परमात्मा विश्व का निर्माण, और संचालन की प्रक्रिया के विषयों में हमारे देश में अनादि काल से चिन्तन होता रहा है । इस चिन्तन द्वारा महर्षियों को जो अनुभूति हुई, उसे ही ‘दर्शन’ का नाम दिया गया है । भारतीय वैदिक दर्शन के छः अंग है न्याय, मीमांसा, वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदान्त । उनमें से वैशेषिक दर्शन के प्रर्वतक महर्षि कणाद थे ।

वायु पुराण के अनुसार महर्षि कणाद द्वारका के समीप प्रभासपाटन में जन्में थे और सोमशर्मा के शिष्य थे । आपका सच्चा नाम उलुक मुनि था ऐसा माना जाता है । आप कश्यप गौत्र के थे । विद्वानों के अनुसार महर्षि कणाद का समय ईसा से 400 वर्ष पूर्व का माना जाता है । यद्यपि कुछ विद्धान् आप को बुद्ध के पूर्व हुए मानते हैं । आप खेत में गिरे हुए अन्न के कण (दाने) चुन चुन कर अपनी भूख का निवारण करते थे । इस प्रकार अनाज के कण र्किंणुअणु के सिद्धान्त के प्रवर्तक होने से आप कणाद कहे गए ।

आपका वैशैषिक सूत्र ही वैशैषिक दर्शन का मूल ग्रन्थ है,प्रशस्तपाद ने उसके उपर पदार्थ धर्मसंग्रह नामक भाष्य लिखा था । वैशैषिक दर्शन का आधार परमाणवाद है । किसी झरोखे की जाली में से आनेवाले धूप के सूर्यकिरणों में उडते हुए दीखनेवाले सूक्ष्म कण का साठवां भाग परमाणु कहलता ळै । यह परमाणु नित्य हैं अपनी विशेषता के कारण प्रत्येक पदार्थ में उसका भिन्न भिन्न अस्तित्व होता है । इन विशेषताओं का विवेचन करने के कारण इस दर्शन का विशेषिक दर्शन कहा गया ।

वैशेषिक दर्शन के अनुसार विश्व सात पदार्थों में विभक्त है द्रव्य, गुण, कर्म, सामन्य, विशेष, समवाय, ओर अभाव । महर्षि कणाद के मत में विश्व का निर्माण नौ द्रव्यों से हुआ है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल , दिशा, मन और आत्मा ।

इस ब्रह्माण्ड में 24 गुण हें रूप, रस, गन्ध, शब्द,स्पर्श, सुख, दुःख, ईच्छा,द्वेष, प्रयत्न , संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, परत्व,अरपत्व, गुरूत्व,द्रवत्व, बुद्धि, स्नेह, संस्कार, धर्म और अधर्म । कर्म के पांच प्रकार है उत्क्षेपण, अवषेक्षण, आकुंचन, प्रसरण ओर गमन । अनेक वस्तुओं में समानता के आधार से उत्पन्न एकतव बुद्धि के आश्रय को सामान्य कहते है जैसे की मनुष्यत्व ।

इस ग्रन्थ में कणाद ऋषि ने धर्म का लक्षण इस प्रकार दर्शाया है ।

यतोभ्युदयनिः श्रेयससिद्धिः स धर्मः।

अर्थात् जिसमें अभ्युदय (इस लोक के सुख व समृद्धि) तथा निःश्रेयस ( पारमार्थिर्क  मोक्ष) दोनों की सिद्धि प्राप्त की जाए वह धर्म है ।